पूरी दुनिया में कोरोना ने कोहराम मचा रखा है। लगभग साढ़े छह लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। डेढ़ करोड़ से ज्यादा लोग इस रहस्यमयी बीमारी की चपेट में हैं। भय और निराशा का वातावरण बन रहा है। अब तक कोरोना के इलाज के लिए कोई विश्वसनीय वैक्सीन नहीं बन सकी है। दुनिया भर के वैज्ञानिक इस बीमारी के इलाज का टीका खोज रहे हैं। लगभग 130 कंपनियां वैक्सीन बनाने में जुटी हैं।इससे पहले इतनी तेज गति का अनुसंधान किसी बीमारी को लेकर नहीं किया गया। दस सालों में बनने वाली वैक्सीन को चंद महीनों में तैयार करने के लिए वैज्ञानिकों ने सुपर कंप्यटरों की मदद ली है।ये आधुनिक कप्यूटर कई लाख गणनाएं निपटाकर वैक्सीन का असर जांच रहे हैं। इसके बावजूद प्रकृति का कोई विकल्प नहीं है।वे गणनाएं जुगाड की वैक्सीन बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहीं हैं लेकिन इन तात्कालिक वैक्सीनों का असर तो कई सालों बाद ही सामने आ पाएगा। आयुर्वेदिक दवाओं ने कोरोना वायरस से निपटने में काफी सहारा दिया है इसके बावजूद जब तक इन दवाओं का वैज्ञानिक आधार नहीं तलाश लिया जाएगा तब तक विश्व का इनका उपयोगिता समझ में नहीं आएगी। कोरोना से निपटने में जैसे हमारी देशी दवाईयां कारगर साबित हो रहीं हैं उसी तरह अर्थव्यवस्था के संकट से भी निजात दिलाने में हमारी देशी अर्थनीति कारगर साबित हो सकती है। कर्ज आधारित आयातित अर्थव्यवस्था का जंजाल हम भुगत रहे हैं। वैश्विक संस्थाओं से कर्ज लेने की होड जगाकर कांग्रेसी सरकारों ने बैंकों का जो सरकारीकरण किया था वो कर्ज के दलदल में समाया गया है। आज भारत पर 90 लाख करोड़ का विदेशी कर्ज हो गया है।नोटबंदी के बाद जब अर्थव्यवस्था को रीसेट किया गया तो काली कमाई का बड़ा हिस्सा घोषित हो गया। लेकिन तभी देश को मालूम पड़ा कि उस पर कर्ज कितनी तेजी से बढ़ता जा रहा है। मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में कर्ज को घटाने के लिए उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दिया फिजूलखर्ची पर रोक लगाकर राज्यों को प्रेरित किया कि वे पूंजी के उत्पादन ढांचे को दुरुस्त करें। इसका नतीजा ये हुआ कि देश में पूंजी का डिजिटलाईजेशन तेजी से हुआ है। देश में समानांतर कारोबार करना कठिन हुआ है। इस बीच कोरोना ने सुधारों की इस रफ्तार का भट्टा बिठा दिया। लॉक डाउन से जूझते शहरों की । आर्थिक गतिविधियां ठप पड़ गईं हैं।ऐसे में भारत के गांवों ने देश को सहारा दिया है। मोदी सरकार ने गांवों में आर्थिक सुधारों की नींव रखते हए खाद्य उत्पादक संगठन (एफपीओ) बनाने पर जोर दिया है। लोगों को प्रेरित किया जा रहा है कि वे गांव स्तर पर खेती उत्पादन की कंपनियां बनाएं। इससे न केवल फसलों का उत्पादन बढ़ेगा बल्कि ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।मनरेगा के माध्यम से कांग्रेस की सरकारों ने जो फर्जी रोजगार मुहैया कराने की योजना लागू की थी वो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है।उससे इकानामी तो बढी नहीं बल्कि देश पर कर्ज का बोझ बढ़ता चला गया है। जिन राज्यों की सरकारों ने केन्द्र की सलाह पर उसकी नीतियों के साथ कदमताल किया उन राज्यों में विकास का पहिया तेजी से घूमा है। जो राज्य राजनीतिक साजिशों के चलते अड़े रहे वे पिछड़ गए। सरकार ने ई मंडी के माध्यम से उपज को दुनिया भर में बेचने की छूट दी है। जाहिर है कि भारत के गांव कोरोना के इस दौर में देश के विकास की कुंजी साबित हो सकते हैं। हमें अवसर को पहचानने और उसे भुनाने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
कोरोना संकट को बनाएं विकास की कुंजी